उद्दालक ऋषि के वंशज का गौत्र
सिद्धपुर, पाटन, सीहोर गुजरात से आए सभी उदेश बंधुओं का पहला प्राचीन स्थान है लखाव ( आबूपर्वत की गोद में लखावत नगर करोड़ीध्वज अनादरा आबूगौड़ परगाना, सिरोही) इधर पहले थे, बाद में कुछ घटनाएं जनहानि हुई तो सभी इस स्थान से बिखरकर अलग स्थानों पर जा बसे।। कुलदेवी मां मुलस्थान पर सदियों से 900 –1000 साल पहले से प्राचीन स्थान है।। भारद्वाज गोत्र के पर्वर अंगिरस दीर्घतामा जो कालांतर में गोतम हुए फिर यह पर्वर गोत्र हुआ इस गोतम वंश में उद्दालक ऋषि हुए अतः इस भारद्वाज गोत्र कुलदेवी मां काली और पर्वर गोतम कुलदेवी संकट का निवारण करने वाली काली स्वरूप चामुण्डा माताजी , शाखा माध्यनदीनी, सूत्र कात्यान , ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण, वेद शुक्ल यजुर्वेद ।
प्राचीन स्थानक उद्दालक वंश पांचाल, काशी, मथुरा, गोंडा, कलापग्राम , उरई , कन्नौज के कान्यबुज ब्राह्मण सभी भारद्वाज गोत्र से जाने गए उत्तराखंड या उत्तरप्रदेश। उद्दालक वंश 942 ईस्वी में सोलंकी राज में आए जो सिद्धपुर दिशा उत्तर देश आए ब्राह्मण उदीच, उदेश कह गए जो कालांतर में यह उदेश शब्द ने एक उदेश गोत्र का रूप लिया ।। फिर और भी क्षेत्र, कर्म, विद्वान पुरुष या विशेष कार्य निमित अनेक अटक बनती गई मूल गोत्र ज्ञान आजीविका के चलते भूलते गए और आपस में ब्याह शादियां भी हुई।।
उद्दालक ऋषि के गुरु धौम्य ऋषि जो कश्यप गोत्र से थे उस समय शिक्षा गुरु गोत्र को भी लगाते थे तो गुरु गोत्र कश्यप की भी कुलदेवी काली थी जो चंद मुंड राक्षस का वध करने पर मां जगदम्बा द्वारा चामुंडा कहा गया।।
Udesh gotra kuldevi shree lakavat Chamunda mataji
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