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उदेश राजपुरोहित का इतिहास अंगिरस वंश ने भारद्वाज गोत्र अपनाया जिसमे उद्दालक गोतम जैसे ऋषि हुए।।

गोत्र : भारद्वाज  उपगोत्र: गोतम ऋषि: महऋषि उद्दालक पुत्र: नसीकेता, श्वेतकेतु पुत्री सुजाता वेद: यजुर्वेद उपवेद: धनुर्वेद सूत्र: कात्यान शाखा: मध्यायदिनी, वाजसनेयी उपनिषद: आरणयंक, छांदोग्य, शतपथ ब्राह्मण  क्षेत्र :ब्रह्मावर्त (काशीया, उत्तरकाशी।।के।। । ।।नन के     या तो ही।     ।।।।।।।।।।,    , पांचाल, कालपी, गोंडा इटियाथोक, उरई जालौन) कुलदेवी: चामुंडा ( माया रूप में मम्माई महामाई, गौरी उमा पार्वती अंबिका द्वारा संकट का हरण करती संकटा माता जो श्यामा गौरी महाकाली रुद्री चामुंडा माताजी)  942 ईस्वी में  सिद्धपुर पाटन मे राजा मूलराज सोलंकी के विशेष अनुष्ठान और आशीर्वाद स्वरूप उत्तराखंड से वेदों और ग्रंथो के ज्ञानार्थी ब्रह्मस्वरूप ब्राह्मण कुल 1037 ब्राह्मण आमंत्रण देकर लाए गए।  1037 ब्राह्मणों में 100 ब्राह्मण काशी हरिद्वार क्षेत्र से उद्दालक वंश थे ।  अनुष्ठान, आशीर्वाद पूर्ण पश्चात इन सभी को दान में गांव दिए जो सिहोर क्षेत्र से लेकर आबू तक इनका राज था , पाटन के पास दान में मिला गांव ईसामली में रहे। 941 से 996 ईस्वी तक म...

उद्दालक ऋषि के वंशज का गौत्र

सिद्धपुर, पाटन, सीहोर गुजरात से आए सभी उदेश बंधुओं का पहला प्राचीन स्थान है लखाव ( आबूपर्वत की गोद में लखावत नगर करोड़ीध्वज अनादरा आबूगौड़ परगाना, सिरोही) इधर  पहले थे, बाद में कुछ घटनाएं जनहानि हुई तो सभी इस स्थान से बिखरकर अलग स्थानों पर जा बसे।। कुलदेवी मां मुलस्थान पर सदियों से 900 –1000 साल पहले से प्राचीन स्थान है।। भारद्वाज गोत्र के पर्वर अंगिरस दीर्घतामा जो कालांतर में गोतम हुए फिर यह पर्वर गोत्र हुआ इस गोतम वंश में उद्दालक ऋषि हुए अतः इस भारद्वाज गोत्र कुलदेवी मां काली और पर्वर गोतम कुलदेवी संकट का निवारण करने वाली काली स्वरूप चामुण्डा माताजी , शाखा माध्यनदीनी, सूत्र कात्यान , ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण, वेद शुक्ल यजुर्वेद ।  प्राचीन स्थानक उद्दालक वंश पांचाल, काशी, मथुरा, गोंडा, कलापग्राम , उरई , कन्नौज के कान्यबुज ब्राह्मण सभी भारद्वाज गोत्र से जाने गए उत्तराखंड या उत्तरप्रदेश। उद्दालक वंश 942 ईस्वी में सोलंकी राज में आए जो सिद्धपुर दिशा उत्तर देश आए ब्राह्मण उदीच, उदेश कह गए जो कालांतर में यह उदेश शब्द ने एक उदेश गोत्र का रूप लिया ।। फिर और भी क्षेत्र, कर्म, विद्वान पुर...

उदेश गौत्र पुरोहित

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 शक्ति माँ जगदम्बा दुर्गा काली स्वरूप, माँ पार्वती के अंग आकर असुरबंधु का जैसे शुम्भ निशुम्भ, चण्ड मुण्ड बंधुओ का नाश करने वाली बंधुकानाशनी माता (चामुण्डा माता ) कहलाई, ये देवी दुर्गमासूर का वध किया तो दुर्गा माता कहलाई, महिसासुर का वध किया तो महिसासूर्मार्दिनी कहलाई ये ही देवी नागनेशी भी कहलाई अतः ऋषि उद्दालक ( अटक वर्तमान में उदेश ) इनका गौत्र भरद्वाज है कुलदेवी चामुण्डा माताजी है! ऋषि - उद्दालक शाखा - मांन्ध्यानंदिनी पर्वर - बृहस्पति, अंगिरा और भारद्वाज अंगिरा के पर्वर में गोतम हुए और गोतम में ही आरुणी, उद्दालक और स्वेतकेतु हुए इसलिए बहोत से कथाओं में आरुणी गौतमा या उद्दालक गौतमा इनके पुत्र श्वेतकेतु नासीकेता पुत्री सुजाता इनका पुत्र अष्टांवक्र ऋषि इनके पिता कहोड़ ऋषि नाम से जाने गए  लेकिन गौत्र भरद्वाज हुआ... भारद्वाज गौत्र का उल्लेख अपने यजमान राव यानि भाट बाबूलालजी मालगांव वाले उदेश गौत्र के चौपडे में उल्लेखकित है! उद्दालक कुरु पांचाल से उतरी पांचाल से थे जहा गुरु द्रोणाचार्य, राजा प्रहवान जवली, काशी के राजा दिवोदास के राजगुरु भारद्वाज थे   लक्ष्मण पुरोहित गौत्र उदेश...